तुमसे कहीं दूर चला जाऊं,
मेरी यादें साथ रखना ।।
तेरी महफ़िल में न मिलूं ,
मेरी मुलाकातें याद रखना ||
तू मेरी अमानत है ,
मेरी हर ख़ुशी तेरा आइना है ||
जब खुद को निहारो शीशे में ,
मेरी निगाहें याद रखना ||
"श्री"
कभी सपनों का महल ,तो कभी आंसुओं की फरियाद है | कभी रेत की ढेर सी खामोश ,तो कभी पेड की छाँव है ये जिंदगी || कभी गीता की पाठ ,तो कभी कुरान की आयात है | एक कारवाँ सपनों का बागबाँ ,तो कभी माझी की नैया और पतवार है ये जिंदगी || कभी काँटों का दामन , कभी जश्ने बहार है| शांति की वीणा ,तो कभी लहू की ललकार एक आवाज़ है ये जिंदगी || कभी ममता की छाँव कहीं ,तो कभी करुणा की तस्वीर है | आने वाले जीवन की, अनुभवों की गीत है ये जिंदगी || -श्रीकुमार गुप्ता
तुमसे कहीं दूर चला जाऊं,
मेरी यादें साथ रखना ।।
तेरी महफ़िल में न मिलूं ,
मेरी मुलाकातें याद रखना ||
तू मेरी अमानत है ,
मेरी हर ख़ुशी तेरा आइना है ||
जब खुद को निहारो शीशे में ,
मेरी निगाहें याद रखना ||
"श्री"
सब कुछ है बस राम नही है,
है मन मे बढ़ता अभिमान,
बदलाव से क्यों संज्ञान ,
मूर्ख बने वाचाल जन्मों से,
बस नारा रह गए राम ।।
भूमि मर्यादा भूल चला,
हर कोई है अनजान,
रावण सा है अभिमान,
नारी के लिए नही सम्मान ,
बस नाम ही राम
न बड़ों का सम्मान ।।
वो धर्म धरा थी ,
राम अर्थ था ,
सीता वचन थी ,
हनुमान ज्ञान थे ,
अंगद शक्ति थी ।।
भरत भाई थे,
सुग्रीव मित्र थे,
वचनों से था,
हर धर्म महान,
बस राम ही राम
हर कंठ में राम ।।
शबरी के जूठे बेरों में
वो मिठास थी
जो आज नही है
पत्थर से सागर तर जाए
वचनों में जज्बात नही है
कलयुग में इतिहास ढूंढते
साक्ष्यों में विश्वास नही है ।।
बस नारा रह गए राम ।।
इतिहास का भारत
भरत का भारत
अयोध्या में आवास नही है
लड़खड़ाते युगों से धरती
नेताओं में विश्वास नही है ।।
बस नारा रह गए राम ।।
"श्री"
न उम्र की बात है,
न जिंदगी की बात,
ये तो प्यार है,
ये सदियों के पार है ।।
रुक जाती है ,
धड़कन जब तू ,
साथ होती है ,
न हो साथ,
तो अक्सर,
उदास होती है ।।
फिर भी हर रोज,
सच्ची मोहब्बत,
होती है,
और तुमपे,
गहरा ये,
यकीन होता है।।
तुम मेरी हो,
ये अहसास यकीं होता है ।।
जीवन संगिनी,
क्या छुपा है तुमसे,
मेरी हर मंजिल अनवरत तेरी काया,
तुम बिन जीवन सुना है,
सरल सा जीवन कठिन हो चला ||
जीवनसंगिनी,
तुम बिन सब सुना,
पुष्प भी काँटों से लगते,
कलियाँ कठोर होती,
मन को कचोटती,
विरह के गीत,
सरोवर की मंद वेग में,
घिर आये मेघ से वंदन
हे मेघ,
कालिदास की विरह,
मेघ दूत बन,
जीवनसंगिनी को,
मेरे कुशल होने का ,
आभास दो,
विरह वेला में जलते,
मन में खलीपन लिए,
तेरी कामना में,
तेरे इंतजार में,
बस तुम्हारा.....
"श्री"
मैं छत्तीसगढ़ हूँ,
कुछ खास नही ,
पर सबके,
दिल के पास हूँ ।
छोटा हूँ, पर
शक्ति रखता हूँ ।
शबरी के बेरों सी,
भक्ति रखता हूँ ।
धान का कटोरा,
हृदय लक्ष्मी रखता हूँ ।
पृथ्वी के सात चक्कर,
सा इस्पात लेकर
कोयला ,टिन, हीरा
अंतरण में रखकर
स्वाभिमान से
सादा जीवन जीकर
देश समृद्धि में
हिस्सेदार बनता हूँ।।
खून पसीना एक कर,
विश्व की धुरी में,
मेहनत मजदूर से,
अभियंता ,डॉक्टर,
वैज्ञानिक की,
विशिष्ट विद्या,
सहेजे रखता हूँ ।
श्री
तुम तुम हो गयी,
मैं मय हो गया ।।
कभी अधरायी सी ,
मोहब्बत स्वर हो गयी ।।
तुम तुम हो ...…....
यकीन फ़िर,
आज पत्थर हो गया ।।
उम्मीद सारी,
ओझल ओस हो गयी ।।
अलसायी सी प्यास,
जख्म हो गयी ।।
नासूर सी तलब ,
बेखबर हो गयी ।।
तुम तुम हो .....
"श्री"