तुम तुम हो गयी,
मैं मय हो गया ।।
कभी अधरायी सी ,
मोहब्बत स्वर हो गयी ।।
तुम तुम हो ...…....
यकीन फ़िर,
आज पत्थर हो गया ।।
उम्मीद सारी,
ओझल ओस हो गयी ।।
अलसायी सी प्यास,
जख्म हो गयी ।।
नासूर सी तलब ,
बेखबर हो गयी ।।
तुम तुम हो .....
"श्री"
कभी सपनों का महल ,तो कभी आंसुओं की फरियाद है | कभी रेत की ढेर सी खामोश ,तो कभी पेड की छाँव है ये जिंदगी || कभी गीता की पाठ ,तो कभी कुरान की आयात है | एक कारवाँ सपनों का बागबाँ ,तो कभी माझी की नैया और पतवार है ये जिंदगी || कभी काँटों का दामन , कभी जश्ने बहार है| शांति की वीणा ,तो कभी लहू की ललकार एक आवाज़ है ये जिंदगी || कभी ममता की छाँव कहीं ,तो कभी करुणा की तस्वीर है | आने वाले जीवन की, अनुभवों की गीत है ये जिंदगी || -श्रीकुमार गुप्ता
तुम तुम हो गयी,
मैं मय हो गया ।।
कभी अधरायी सी ,
मोहब्बत स्वर हो गयी ।।
तुम तुम हो ...…....
यकीन फ़िर,
आज पत्थर हो गया ।।
उम्मीद सारी,
ओझल ओस हो गयी ।।
अलसायी सी प्यास,
जख्म हो गयी ।।
नासूर सी तलब ,
बेखबर हो गयी ।।
तुम तुम हो .....
"श्री"
गुलजार होगी
सुबह फिर
तुम्हारी यादों के साथ
एक पल साथ जी लो
वजह साफ़ होगी
जीने के लिए आज ।।
मेरे अरमानो का यही फलसफा होगा ।।
ता उम्र यादें इन्तजारे इंतजा होगा ।।
कुछ गुस्ताखियाँ अनजाने,
वो कर लिया करते हैं ।।
मोहब्बत इसी से हम,
उम्र भर कर लिया करते हैं ।।
जब मिलते हो तो लम्हा सा लगता है
आज महसूस हुआ की जमाना बदल गया।।
जाओ तुम बिन जी लेंगे
बिन साँस ही रह लेंगे
जो लम्हें साथ गुजारे
उनकी माला पिरो लेंगे ।।
इन्तजार में आप की ,रो लिए दो बूंद भर
जब मुलाक़ात हो, कीमत वसूल लेंगे ।।
कभी फुर्सत में देख कर मुस्कुरा लिया करो,
थोड़ी खुशियाँ दिन की थकां मिटा देती है ।।
तेरी तस्वीर आज मेरा आइना होंगी ,
शायद उन्ही आँखों से तुम्हे निहार लेंगे ।।
किताबों के पन्ने
पलट रहें हैं ग़ालिब
कुछ समझ में आए
कोई समझा गया ।।
तेरी अमिरिय्त की तारीफ करता हूँ ग़ालिब
जब तक गरीब था जवाब ढूंढ़ता था
आज आमिर हूँ सवाल ढूढ़ता हूँ ।।
वक्त से पहले किस्मत भी नही मिलती ग़ालिब
लोग यूँ ही किस्मत को कोसते हैं ।।
वक्त मजधार में
आज हम पुरानी शामें
याद करते हैं
हम हैं मुसाफिर ग़ालिब
तेरा दीदार याद करते हैं ।।
मजहबियों से मेरा यकीन खाक हो चला
आज मेरा दोस्त मुसलमान हो चला ।।
ग़ालिब जमाने को हमारी परवाह नही
हम तो यूँ ही कतल पे क्त्ल किये जाते हैं ।।
तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
अब्दुल कलाम जी के लिए
ये तूफान के आने की सुगबुगाहट है ग़ालिब
अभी न सम्हले तो डूब जाओगे
काफिला यूँ चला
मै फिरता रहा जमाने में
दै हो दरम के लिए
जब मिला अपनों से
गुलिस्तान नजर आया ।।
तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
कलाम साहब के लिए दो शब्द ।।