शायरी
कभी सपनों का महल ,तो कभी आंसुओं की फरियाद है | कभी रेत की ढेर सी खामोश ,तो कभी पेड की छाँव है ये जिंदगी || कभी गीता की पाठ ,तो कभी कुरान की आयात है | एक कारवाँ सपनों का बागबाँ ,तो कभी माझी की नैया और पतवार है ये जिंदगी || कभी काँटों का दामन , कभी जश्ने बहार है| शांति की वीणा ,तो कभी लहू की ललकार एक आवाज़ है ये जिंदगी || कभी ममता की छाँव कहीं ,तो कभी करुणा की तस्वीर है | आने वाले जीवन की, अनुभवों की गीत है ये जिंदगी || -श्रीकुमार गुप्ता
Tuesday, December 15, 2015
Thursday, December 10, 2015
Thursday, July 2, 2015
मुस्कान
किताबों के पन्ने
पलट रहें हैं ग़ालिब
कुछ समझ में आए
कोई समझा गया ।।
तेरी अमिरिय्त की तारीफ करता हूँ ग़ालिब
जब तक गरीब था जवाब ढूंढ़ता था
आज आमिर हूँ सवाल ढूढ़ता हूँ ।।
वक्त से पहले किस्मत भी नही मिलती ग़ालिब
लोग यूँ ही किस्मत को कोसते हैं ।।
वक्त मजधार में
आज हम पुरानी शामें
याद करते हैं
हम हैं मुसाफिर ग़ालिब
तेरा दीदार याद करते हैं ।।
मजहबियों से मेरा यकीन खाक हो चला
आज मेरा दोस्त मुसलमान हो चला ।।
ग़ालिब जमाने को हमारी परवाह नही
हम तो यूँ ही कतल पे क्त्ल किये जाते हैं ।।
तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
अब्दुल कलाम जी के लिए
ये तूफान के आने की सुगबुगाहट है ग़ालिब
अभी न सम्हले तो डूब जाओगे
काफिला यूँ चला
मै फिरता रहा जमाने में
दै हो दरम के लिए
जब मिला अपनों से
गुलिस्तान नजर आया ।।
तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
कलाम साहब के लिए दो शब्द ।।
Thursday, May 7, 2015
माँ#32
तेरी गोदी मेरा सर,
काश की दो पल,
माँ फिर से तुम लाओ।।
वो हिंदी गीत,
सुनहरे सपने ,
माँ फिर से दिखाओ ।।
थक गया मै,
देर हुई बहुत,
वो मीठे आम,
माँ फिर से खिलाओ ।।
वो गुड्डी और गुड्डों,
की छोटी सी दुनिया,
वो छोटे से मंडप,
माँ फिर से सजाओ ।।
थोड़े से पैसों के,
वो ग्लूकोस की बिस्कुट,
माँ फिर से खिलाओ ।।
आज गर्मी है बहुत,
आम का जूस,
वो मटकी से पानी,
माँ जल्दी पिलाओ ।।
आज गर्मी है,
अपने आंचल में,
वो हाथ का पंखा,
माँ जल्दी झुलाओ ।।
आज सर्दी है बहुत,
वो कान बंद,
उन के स्वेटर,
पैरों में मोज़े,
माँ फिर से पहनाओ,
माँ तेरी ममता ......
नज्म ऐ भोपाल #शेर
मै तो बस राह के मंजर पे
अपनी नाव खेता हूँ
और धारा को समझता हूँ ||
मौला
तेरे दर आना सबको पड़ता है
चाहे मोहरे जितने जूटा लो
जाना खाली हाथ पड़ता है ||
शायद गलत हम निकले
जो दियेबान जलाये बैठे
एक वो हैं जिन्होंने
पागल समझ लिया ||
चेहरों पे यकीन करना छोड़ ग़ालिब
चंद मोहरों में इंसान बदल जाते हैं |
तेरी और मेरी बंदगी में,
फर्क सिर्फ इतना है ||
मै तुमको मांगता हूँ,
और तुम खुशियाँ || ....
तेरी बेगुनाही का सबूत मिलता नही
और तुम बेगुनाह बने फिरते हो ||
"श्री"
Thursday, April 16, 2015
जरूरत #शेर
जलाते रहिए,
कुछ देर के लिए ही सहीं,
अँधेरे मिटाते रहिए,
बड़ी रँगी है ,
ये जिन्दगी,
अपनी नाव दरिया में,
चलाते रहिए ||
जब चलता हूँ भोपाल की झीलों के किनारे,
अरपा का वो किनारा याद आता है,
जिस राह पर छोड़ आया हूँ अपनी जिन्दगी,
वो बसेरा याद आता है ||
लाख सितम हो मोहब्बत में श्री
जेब में अगर पैसे न हो तो सितम गहरा होगा ||
हम चुप रहते हैं
दुनिया से कभी न कहते हैं
कभी आओ फुर्सत से बैठो
जानोगे इतनी सिद्दत से तुम्हे याद कैसे किया करते है ||
तेरी महफिल सुनी आज भी है ,
चाहे दिए कितने भी रोशन क्यों न हो,
दिल में अंधियारी आज भी होगी,
तेरी बेवफाई का सिला ही कहलो,
कल तक तजुर्बे लिया करते थे,
आज दिया करते है ||
कौन कहता है मोहब्बत नही बिकते दोस्त,
मैंने अमीरों के दरबार में मोहब्बत को नाचते देखा है ||
आंबेडकर जयंती
जब याद आती है general की कम होती सीटें ,
St Sc के रोज बढ़ते आरक्षण ,
अपनी अच्छाइयों को दिया दिखता हूँ ,
मै अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||
पश्चाताप के आंसू लिए ,
सामान्य वर्ग होने पर लानत लगता हूँ ,
गम में डूबा अपने हालात के पन्ने याद दिलाता हूँ,
मै अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||
IIT की सीट लिए,
अपने आमिर जनजातीय दोस्तों को याद करता हूँ ,
हाँ मै सामान्य वर्ग का नागरिक,
अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||