Thursday, March 3, 2016

इंतहा#31

आज कुछ देर यूँ लगा,
मानो तुम फिरसे,
उन्ही आँखों से,
निहारती हो,

अंगड़ाईयां मानो,
थपकी देकर जगाती है,
और तुम सपनों से,
ऒझ्ल हो जाती हो,
क्या पता शायद,
मै हूँ या वहम।।

फिर भी न जाने क्यों,
हर दस्तक पे,
दिल कचोटता है,
तेरे न होने पे,
हर बार रोता है,

मायूस हूँ थोडा,
बेबसी साथ रखता हूँ,
जेबकतरे बहुत है,
बाज़ारों  में,
तुम्हे दिल में,
सहेजे रखता हूँ।

जिंदगी का क्या भरोसा,
जाने कब तक साथ,
दिल में आज भी,
तेरी तस्वीर रखता हूँ।

"श्री"

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