Thursday, July 2, 2015

मुस्कान

किताबों के पन्ने
पलट रहें हैं ग़ालिब
कुछ समझ में आए
कोई समझा गया ।।

तेरी अमिरिय्त की तारीफ करता हूँ ग़ालिब
जब तक गरीब था जवाब ढूंढ़ता था
आज आमिर हूँ सवाल ढूढ़ता हूँ ।।

वक्त से पहले किस्मत भी नही मिलती ग़ालिब
लोग यूँ ही किस्मत को कोसते हैं ।।

वक्त मजधार में
आज हम पुरानी शामें
याद करते हैं
हम हैं मुसाफिर ग़ालिब
तेरा दीदार याद करते हैं ।।

मजहबियों से मेरा यकीन खाक हो चला
आज मेरा दोस्त  मुसलमान हो चला ।।

ग़ालिब जमाने को हमारी परवाह नही
हम तो यूँ ही कतल पे क्त्ल किये जाते हैं ।।

तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
अब्दुल कलाम जी के लिए

ये तूफान के आने की सुगबुगाहट है ग़ालिब
अभी न सम्हले तो डूब जाओगे

काफिला यूँ चला
मै फिरता रहा जमाने में
दै हो दरम के लिए
जब मिला अपनों से
गुलिस्तान नजर आया ।।

तेरे न होने पे मेरा तिरंगा भी रो गया ग़ालिब
तेरी मुस्कान पे हिंदुस्तान नजर आया ।।
कलाम साहब के लिए दो शब्द ।।

Thursday, May 7, 2015

माँ#32

 माँ तेरी ममता, 
तेरी गोदी मेरा सर,
काश की दो पल,
माँ फिर से तुम लाओ।।


वो प्यारी लोरी,
वो हिंदी गीत,
सुनहरे सपने ,
माँ फिर से दिखाओ ।।

थक गया मै,
देर हुई बहुत,
वो मीठे आम,
माँ फिर से खिलाओ ।।


वो  गुड्डी और गुड्डों,
की छोटी सी दुनिया,
वो छोटे से मंडप,
माँ फिर से सजाओ ।।

थोड़े से पैसों के,
ठेले की कुल्फी,
वो ग्लूकोस की बिस्कुट,
माँ फिर से खिलाओ ।।


आज गर्मी है बहुत,
आम का जूस,
जल्दी लाओ,
वो मटकी से पानी,
माँ जल्दी पिलाओ ।।

आज गर्मी है,
अपने आंचल में,
वो हाथ का पंखा,
माँ जल्दी झुलाओ ।।

आज सर्दी है बहुत,
वो कान बंद,
उन के स्वेटर,
पैरों  में मोज़े,
माँ फिर से पहनाओ,
माँ तेरी ममता ......





 

नज्म ऐ भोपाल #शेर

मेरी तो फितरत है बहना
मै तो बस राह के मंजर पे
अपनी नाव खेता हूँ
और धारा को समझता हूँ ||


ये तेरी फितरत है या हुनर
मौला
तेरे दर आना सबको पड़ता है
चाहे मोहरे जितने जूटा लो
जाना खाली हाथ पड़ता है ||

शायद गलत हम निकले
जो दियेबान जलाये बैठे
एक वो हैं जिन्होंने
पागल समझ लिया ||

चेहरों पे यकीन करना छोड़ ग़ालिब
चंद मोहरों में इंसान बदल जाते हैं |

तेरी और मेरी बंदगी में,
फर्क सिर्फ इतना है ||
मै तुमको मांगता हूँ,
और तुम खुशियाँ || ....

तेरी बेगुनाही का सबूत मिलता नही
और तुम बेगुनाह बने फिरते हो ||


"श्री"

Thursday, April 16, 2015

जरूरत #शेर

दिए मन्नतों के,
जलाते रहिए,
कुछ देर के लिए ही सहीं,
अँधेरे मिटाते रहिए,
बड़ी रँगी है ,
ये जिन्दगी,
अपनी नाव दरिया में,
चलाते रहिए ||

जब चलता हूँ भोपाल की झीलों के किनारे,
अरपा का वो किनारा याद आता है,
जिस राह पर छोड़ आया हूँ अपनी जिन्दगी,
वो बसेरा याद आता है ||

लाख सितम हो मोहब्बत में श्री
जेब में अगर पैसे न हो तो सितम गहरा होगा ||

हम चुप रहते हैं
दुनिया से कभी न कहते हैं
कभी आओ फुर्सत से बैठो
जानोगे इतनी सिद्दत से तुम्हे याद कैसे किया करते है ||

तेरी महफिल सुनी आज भी है ,
चाहे दिए कितने भी रोशन क्यों न हो,
दिल में अंधियारी आज भी होगी,
तेरी बेवफाई का सिला ही कहलो,
कल तक तजुर्बे लिया करते थे,
आज दिया करते है ||


कौन कहता है मोहब्बत नही बिकते दोस्त,
मैंने अमीरों के दरबार में मोहब्बत को नाचते देखा है || 

आंबेडकर जयंती

मै अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ,
जब याद आती है general की कम होती सीटें ,
St Sc के रोज बढ़ते आरक्षण ,
अपनी अच्छाइयों को दिया दिखता हूँ ,
मै अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||


पश्चाताप के आंसू लिए ,
सामान्य वर्ग होने पर लानत लगता हूँ ,
गम में डूबा अपने हालात के पन्ने याद दिलाता हूँ,
मै अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||

IIT की सीट लिए,
अपने आमिर जनजातीय दोस्तों को याद करता हूँ ,
हाँ मै सामान्य वर्ग का नागरिक,
अम्बेडकर जयंती जरुर मनाता हूँ ||

Wednesday, March 25, 2015

प्यारी बिटिया# 28

मुस्कुराती नन्ही परी
अरमानो का दिया
देवी की मूरत कहूँ
या सितारों का टुकड़ा
इतनी प्यारी है
प्यारी बिटिया

किस्मत वालों के नसीब में
ये प्यारी बिटिया
नसीबों की फुल है ये
मन्नतों का दिया
बरकतों का समुंदर है
और रौनक का कँवल
मुबारक हो तुमको
प्यारी बिटिया

काश की तुम समझ सको
हैवानियत का गणित हल कर सको
अपने सूखे दिए को रोशन कर सको
किसी से कम नही है ये बिटिया
सब की लाडली है ये बिटिया
जीवन की अमृत है
प्यारी बिटिया




मौसम है शायराना

धुंधली धुंधली हो चली अपनी मोहब्बत की कस्ती
वक्त पूछता है मरहम किसके थे और घाव किसके


मोहब्बत न सही मेरी मौत बेहतर हो
शायद मेरी तकलीफ से तुझे चैन आ जाये


तुझ से मिलना मुकम्मल न सहीं
पर तुझ से जुडी हर यादें
मेरे अतीत को सजदा करती है
सूख गयी वो गुलाब की कली
जिनमे तेरे प्यार की कसक आज भी है

अश्क तुझ से ज्यादा
हमने बहाए हैं दोस्त
शायद वक्त के थपेड़ों में
अपनी मजिल की तलाश में
तुमने उन्हें न देखा


तलाश गर वफा की करती हो,
मै अधूरा सा पन्ने तेरे मोहब्बत के,
जला आया हूँ ,
इसे मेरी मोहब्बत का सिला ही कहलो,
आज उसी राख से ,
गंगा में तेरा नाम बहा आया हूँ ||


कारवां है की थमता नही
आज हम गुलजार हो चले
आसन सा सफर कठिन हो चला
बस तकलीफ है की
सफर में तेरा साथ नही