नक्सलवाद
लहू की गंगा
और ख़ूनी आँख ,
इसी का नाम है
नक्सलवाद |
कहो मारोगे ,
या काटोगे ,
या जिन्दा
जलाओगे |
दल दल हो
तुम,
क्रोध की
अग्नि में,
एक दिन खुद ही
भस्म हो जाओगे |
एक गँदगी हो तुम ,
अपनी गलती दोहराते हो ,
बस भोग विलास के
बहाने तलासते हो |
बदलना चाहते हो सत्ता ,
और सामने आने
से भी घबराते हो |
अपनी ऊँची बातों से ,
भोले ग्रामीणों को
बहकाते हो |
न ये कारवाँ रुकेगा ,
न तुम सफल हो पाओगे ,
एक काले धब्बे से ,
बस अपनी औकात
दिखाओगे |
वो गौरव के सितारे है |
जो शहीद हुए ,
तुम तो बिना कफ़न के ही ,
दफ़न हो जाओगे |
और मिटटी की
गहराई में ,
अपने कोरे अस्तित्व
को पाओगे |
श्रीकुमार गुप्ता
कभी सपनों का महल ,तो कभी आंसुओं की फरियाद है | कभी रेत की ढेर सी खामोश ,तो कभी पेड की छाँव है ये जिंदगी || कभी गीता की पाठ ,तो कभी कुरान की आयात है | एक कारवाँ सपनों का बागबाँ ,तो कभी माझी की नैया और पतवार है ये जिंदगी || कभी काँटों का दामन , कभी जश्ने बहार है| शांति की वीणा ,तो कभी लहू की ललकार एक आवाज़ है ये जिंदगी || कभी ममता की छाँव कहीं ,तो कभी करुणा की तस्वीर है | आने वाले जीवन की, अनुभवों की गीत है ये जिंदगी || -श्रीकुमार गुप्ता
Thursday, April 8, 2010
Tuesday, April 6, 2010
कौन यहाँ जिन्दा रहता है.........................
कौन यहाँ जिन्दा रहता है.........................
कौन होता है किसी का दुश्मन ,
कम्बख्त दोस्त ही दगा देता है |
क्या पाओगे किसी का खून करके ,
कम्बख्त खून ही आंसू देता है |
चीर दूँ दुनिया तेरे प्यार के लिए ,
कमबख्त दिल ही दगा देता है |
वो तो मौत ही ठुकराती है हमें ,
वरना कौन यहाँ जिन्दा रहता है |
कौन होता है किसी का दुश्मन ,
कम्बख्त दोस्त ही दगा देता है |
क्या पाओगे किसी का खून करके ,
कम्बख्त खून ही आंसू देता है |
चीर दूँ दुनिया तेरे प्यार के लिए ,
कमबख्त दिल ही दगा देता है |
वो तो मौत ही ठुकराती है हमें ,
वरना कौन यहाँ जिन्दा रहता है |
Thursday, April 1, 2010
मोहतरमा
वो काँटों का दर्द भी ना सह सके .......................
है तवज्जुब बड़ी बेशर्म वो हया ,
जो परवानो से रुकसत ना हो सके |
एक अनजूबन थी मोहब्बत मेरी ,
और वो खुद से भी प्यार ना कर सके |
हम वफा कि तराजू पे बैठे जनम ,
वो पल का हिसाब भी ना दे सके |
जब भी लाल होती शाम जळते हर पल को हम ,
वो एक चिंगारी से आग भी ना बन सके |
तेरी अदा पे है जलते और मरते है हम,
वो काँटों का दर्द भी ना सह सके |
है तवज्जुब बड़ी बेशर्म वो हया ,
जो परवानो से रुकसत ना हो सके |
एक अनजूबन थी मोहब्बत मेरी ,
और वो खुद से भी प्यार ना कर सके |
हम वफा कि तराजू पे बैठे जनम ,
वो पल का हिसाब भी ना दे सके |
जब भी लाल होती शाम जळते हर पल को हम ,
वो एक चिंगारी से आग भी ना बन सके |
तेरी अदा पे है जलते और मरते है हम,
वो काँटों का दर्द भी ना सह सके |
Monday, March 29, 2010
शायद कभी #8
शायद कभी .............
शायद कभी .............
शायद कभी वो पल ना आता,
जीवन का वो कल ना आता,
रुला रुला मरहम न भरता ,
दिल मे मेरे गम ना भरता ।
जिंदगी जन्नत वो करके ,
जिंदगी से आ लडी थी,
मुझ को तो लगता था जैसे ,
जन्मों कि बिछ्डी मिली थी |
बातों मे खोया हुआ ,
लगता था कोई अपनी मिली थी,
लगता था जादुई छडी थी ,
दिल मे मेरी आ पडी थी |
आँसुओं कि वो लडी थी ,
जाने कैसी वो घडी थी,
बात करना भूल कर वो,
देख कर भी चुप खडी थी |
दिल मे तो गम का था साया,
आंखो मे शर्मिंदगी थी,
लगता था मेरे लिए वो,
अंबर तल पर आ खडी थी |
पल दो पल कि खुशियाँ देकर,
जाने क्यो गुमशुम खडी थी,
जिंदगी जन्नत वो करके ,
जिंदगी से आ लडी थी |
भूल कर रिश्ते वो नाते,
पत्थरों सी वो खडी थी,
जाने कैसी वो घडी थी ,
रुठ कर बिछ्डी चली थी ।
"श्री"
Sunday, March 21, 2010
बचपन #1(OLDEN DAYS WAS GOLDEN DAYS )1
बचपन
एक लम्बी सांस,
और धूप कि रानी,
घंटों जीवन,
अजब कहानी।
वो मिट्टी के घर,
और कंचा लडाई,
लम्बे - लम्बे रास्ते,
और अपनी सवारी ।
कभी यारों कि यारी,
कभी खूब लडाई,
अपने घरौंदे
प्यार कि निशानी।
वो होली की रंगत,
और दिपों की थाली,
थोड़े से पैसे ,
और खूब उधारी।
मिठी मिठी यादें,
अब लम्बी कहानी,
मंदिर कि पूजा,
और पूजा कि थाली।
वो मिठी सी यादें,
अब लम्बी रुआंसी,
ये निर्जल आँसू,
अब प्यारी कहानी।
श्रीकुमार गुप्ता
Saturday, March 20, 2010
TERRORIST
Monday, March 15, 2010
THE BURNING PERSON 43
जब खुशियों से सब जलते हैं ......
किसको समझे हम अपना,
जब खुशियों से सब जलते हैं ||
किसी के खातिर खून बहा कर ,
हेय में खुशियाँ भरतें हैं |
और किसी को देख ख़ुशी में,
ज्वाला से हम जलते हैं ||
टीसुओं से कर मोह्भ्रमित,
जब कर्त्तव्य निर्वहन करते हैं |
और किसी के खेल हेय से,
पंछी के पर उड़ते हैं ||
किसको समझे हम अपना,
जब खुशियों से सब जलते हैं ||
किसी के खातिर खून बहा कर ,
हेय में खुशियाँ भरतें हैं |
और किसी को देख ख़ुशी में,
ज्वाला से हम जलते हैं ||
टीसुओं से कर मोह्भ्रमित,
जब कर्त्तव्य निर्वहन करते हैं |
और किसी के खेल हेय से,
पंछी के पर उड़ते हैं ||
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